एक बार एक नदी को पार करने की प्रतियोगिता हुई।
बहुत लोगों ने हिस्सा लिया। प्रतियोगिता को देखने वालों की सब जगह भीड़ जमा हो गयी। हर तरफ शोर ही शोर था।
प्रतियोगियों ने तैरना शुरू किया। लेकिन तेज बहाव को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी आदमी को ये यकीन नहीं हो रहा था कि कोई भी व्यक्ति कैसे उसे पार कर पायेगा।
हर तरफ यही सुनाई देता "अरे ये बहुत कठिन है। ये लोग कभी भी इस नदी को पार नहीं कर पायंगे, सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं। इतने तेज बहाव में पार किया ही नहीं जा सकता।
और यही हो भी रहा था। जो भी आदमी कोशिश करता, वो थोडा आगे जाकर फिर पीछे आ जाता। कई लोग अपने प्रयास में लगे हुए थे। पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, "ये नहीं हो सकता!! असंभव!!"
और वो उत्साहित प्रतियोगी भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास धीरे धीरे करके छोड़ने लगे। लेकिन उन्हीं लोगों के बीच एक प्रतियोगी था, जो बार -बार पीछे आने पर भी उसी जोश के साथ उसे पार करने में लगा हुआ था।
वो लगातार आगे की ओर बढ़ता रहा था और अंततः वह नदी के दूसरे किनारे पर पहुच गया और इस प्रतियोगिता का विजेता बना। उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ और पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया? भला अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली? तभी पीछे से एक आवाज़ आई
"अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है।"
दोस्तों, हम सब के अंदर असीम सम्भावनाएं होती हैं और अपना लक्ष्य प्राप्त करने की क्षमताएँ भी होती हैं लेकिन हम अपने परिवेश और मौजूदा वातावरण में फैले नकारात्मकता की वजह से खुद को काम आंकते हैं और हिम्मत हार जाते हैं और इसी वजह से अपने बड़े से बड़े सपनों के साथ समझौता कर लेते हैं और उन्हें बिना पूरा किये ही जिंदगी गुज़ार देते हैं दोस्तों, ये कहानी हमें यही सिखाती है की आईये हम, हमें कमजोर बनाने वाली हर एक आवाज को अनसुना करें और उसके प्रति बहरे हो जाएँ तथा सिर्फ लक्ष्य को केंद्रित कर आगे बढ़ते चलें। याद रखिये कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।