सोम नाथ का मन्दिर लूट कर महमूद गजनबी वापिस गजनी जा रहा था। उसके साथ एक लाख की सेना थी।
एक पड़ाव पर जैसे ही सेना पहुँची तो उन्होंने देखा कि डेढ़ सौ घुड़सवारों का एक जत्था लोहा लेने के लिये तीर की तरह बढ़ता आ रहा है। टुकड़ी का नेतृत्व एक सत्तर वर्ष का बूढ़ा राजपूत कर रहा था।
महमूद गजनबी समझ नहीं सका कि इतनी छोटी टुकड़ी आखिर क्यों एक लाख सेना से लड़ कर अपने को समाप्त करने आ रही है। उसने दूत भेजा और इन लड़ाकुओं का मंतव्य पुछवाया।
बूढ़े नायक ने कहा, "बादशाह से कहना, संख्या और साधन−बल में इतना अन्तर होने पर भी लड़ने का क्या परिणाम हो सकता है सो हम जानते हैं। पर भूलें यह भी नहीं कि अनीति को जीवित रहते सहन नहीं करना चाहिये।"
घुड़सवारों की टुकड़ी जान हथेली पर रख कर इस तरह लड़ी कि डेढ़ सौ ने देखते−देखते डेढ़ हजार को धराशायी बना दिया। ग़ज़नवी की सेना को भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। मरते दम तक वे यही कहते रहे, यदि हम प्रतिरोधी एक हजार भी होते तो इन एक लाख से निपटने के लिये पर्याप्त थे।
इस बिजली झपट लड़ाई का महमूद पर भारी प्रभाव पड़ा। वह राजपूतों की अद्भुत वीरता पर अवाक् रह गया। उन्होंने युद्ध के दौरान अपने प्राणों को खो कर भी बुद्धिमानी, निडरता, देश भक्ति और वीरता का परिचय दिया।
भारतीय वीर गाथा ऐसी ही है। अपने प्राण गंवाकर भी उन्होंने अपनी आन, बान और शान को कभी झुकने न दिया। इसी कारण आज भी उनका नाम इतहास के पन्नो पर चमक रहा है।