Gilehri Ka Ghar | भारत संस्कारों की जननी
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गिलहरी का घर


एक गिलहरी एक पेड़ पर

बना रही है अपना घर,

देख-भाल कर उसने पाया

खाली है उसका कोटर ।


कभी इधर से, कभी उधर से

कुदक-फुदक घर-घर जाती,

चिथड़ा-गुदड़ा, सुतली, तागा

ले जाती जो कुछ पाती ।


ले जाती वह मुँह में दाबे

कोटर में रख-रख आती,

देख बड़ा सामान इकट्ठा

किलक-किलककर वह गाती ।

चिथड़े-गुदडे़, सुतली, धागे-

सब को अन्दर फैलाकर,

काट कुतरकर एक बराबर

एक बनायेगी बिस्तर ।


फिर जब उसके बच्चे होंगे

उस पर उन्हें सुलायेगी,

और उन्हीं के साथ लेटकर

लोरी उन्हें सुनायेगी ।

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गिलहरी का घर
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