Ek Zara Sa Bachcha | भारत संस्कारों की जननी
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एक ज़रा सा बच्चा


एक ज़रा सा बच्चा घर का,

सब माहौल बदल देता है।

बच्चे का कमरे में होना,

है खुशियों का एक खिलौना।

उछल कूद कितनी प्यारी है,

जैसे जंगल में मृग छौना।

बच्चों का हँसना मुस्काना,

भीतर तक संबल देता है।

हा हा ही ही हू हू वाली,

योग साधना बहुत सबल है।

सत मिलता है चित मिलता है,

और आनंद इसी का फल है।

निर्मल मन से फूटा झरना,

कितना मीठा जल देता है।

बच्चे सदा आज में जीते,

कल की चिंता उन्हें कहाँ है।

नहीं बंधे हैं वह बंधन में,

उनका तो संपूर्ण जहां है।

जितनी देर रहो उनके संग,

ख़ुशियाँ ही हर पल देता है।

कहाँ द्वेष है? कहाँ जलन है?

बच्चों के निर्मल से मन में।

अल्लाह ईसा राम लिखा है,

उनके तन मन के कण कण में।

बच्चों के पल पल का जीवन,

सब प्रश्नों के हल देता है।

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एक ज़रा सा बच्चा
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