दार्शनिक कवितायेँ | भारत संस्कारों की जननी
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कविताएँ >> दार्शनिक कवितायेँ

राह कौन सी जाऊँ मैं?
- Atal Bihari Vajpayee
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मौत से ठन गई
- Atal Bihari Vajpayee
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हरी हरी दूब पर
- Atal Bihari Vajpayee
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जलियाँवाला बाग में बसंत
- Subhadra Kumari Chauhan
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हालाते जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब
- Dushyant Kumar
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हम दीवानों की क्या हस्ती
- Bhagwati Charan Verma
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स्त्री
- Sumitranandan Pant
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शासन की बंदूक
- Nagarjun
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सतपुड़ा के घने जंगल
- Bhawani Prasad Mishra
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ये सारा जिस्म झुक कर
- Dushyant Kumar
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मैं नीर भरी दुख की बदली
- Mahadevi Verma
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मेरी दुल्‍हन सी रातों को
- Gopal Singh Nepali
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कुबेर धन प्राप्ति मंत्र
- Anonymous
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